Pandit Shivans

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According to astrology, The central principle of astrology is mapping of the individual with the cosmos, all parts of which are interrelated with each other.

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  • Uttar Pradesh, 246761
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  • राहु को जाने कुंडली के बारह भावों में-



    यदि लग्न में राहु हो तो  आदमी शरीर से बलवान् होता है।और माइंड शार्प होता है किन्तु इसके शरीर के ऊपर के हिन्से में कोई रोग हो । यहाँ का राहु व्यक्ति को ओवर थिंकिंग करने वाला भी बनाता है,और सिरदर्द की समस्या बनी रह सकती है,ऐसे जातक अक्सर सकीमिजाज भी होते है ।

    यदि द्वितीय स्थान में राहु हो तो वह विशिष्ट बात बोलने वाला होगा अर्थात् गुप्त बात बोलने वाला या दो अर्थ की बात बोलने बाला हो । ज्योतिष में राहु को चोर माना गया है। बोर द्वितीय स्थान वाणी का स्थान है। इस कारण जिसके वितीय में राहु होगा वह कपट की वाणी बोलेगा । द्वितीय में राहु होने से मुख रोग होने की संभावना भी है । द्वितीय राहु वालों की वाणी आकर्षित होती है किसी को भी अपनी वाणी से अपना बना लेते है ।

     यदि राहु तृतीय में हो तो जातक मानी , भाइयों का विरोधी, धनी, दीर्घायु, और दृढ़ बुद्धि वाला होता  तथा अपने बाहुबल अपनी हिम्मत से बड़ा आदमी बनता है तृतीय का राहु राजयोग कारक होता है। यहाँ स्थित राहु को अच्छा माना जाता है 

    यदि चतुर्थ में राहु हो तो जातक मूर्ख, दुःख देने वाला, किन्तु मित्रों सहित होता है; ऐसा व्यक्ति अल्पायु होता है यहाँ स्थित राहु जन्मभूमि और माता के सुखों में भी कमी लाता है.परंतु यहाँ स्थित राहु राजनीति और मार्केटिंग के व्यवसाय में अच्छे परिणाम देता है ।

    यदि पंचम में राहु हो तो संतान से कम सुखी अथवा संतान भी दुखी हो सकती है , कठोर हृदय और कृष (पतला) शरीर वाला हो। पेट का नीचे का बगली भाग कुक्षि बहलाता है। ऐसा व्यक्ति नाक से बोलता है अर्थात् नासिका का ज़्यादा प्रयोग करता है बोलने में परंतु अगर मित्र या शुभ राशि में बैठा हो तो तेज बुद्धि का मालिक भी बनाता है ।

    यदि छठे स्थान में राहु हो तो यहाँ भी बहुत शुभ माना जाता है, किसी भी प्रकार की प्रतियोगिता में जीत दिलाता है,शत्रु हंता राहु यहाँ स्थित होने से हर प्रकार के शत्रुओं से विजय दिलाता है,परंतु यहाँ स्थित राहु कभी कभी गुप्त रोग भी दे देता है ।

      सप्तम में राहू हो तो  वो जातक स्वतन्त्र किन्तु अल्पबुद्धिवाना होता है ऐसा जातक पत्नी पर अक्सर सक किया करता है,ऐसे जातक या जातिका के पार्टनर से संबंध अच्छे नहीं माने जाते है,वैवाहिक जीवन के लिए यहाँ स्थित राहु अच्छे परिणाम नहीं देता है ।

    यदि अष्टम में राहु हो वो बात पित से पीड़ित, कम संतान  बाला, अल्पायु बोर करनेवाला होता है,ऐसे जातकों के साथ गुप्त परेशानिया हमेशा लगी रहती है,परंतु ऐसा जातक गूढ़ और पराविद्याओं में निपुण होता है ,अचानक धन भी इनके पास खूब आता है ।


    यदि नवम में राहु हो तो जातक प्रतिकूल वचन बोलने वाला होता है,ऐसा जातक किसी  समुदाय, नगर का नेता होता है।अधिक यात्रा करने वाला होता है,अत्यंत प्राकर्मी और साहसी होता है है,।

     यदि दशम का राहु होतो जातक राजनीतिज्ञ होता है,बहुत सारे कामों को करने वाला होता है,अपने कार्यों में निपुण मार्केटिंग में ऐसे लोग बहुत सफल होते है,परंतु कैरियर में स्थिरता की कमी बनी रहती है ।

    यदि एकादश भाव में राहु हो तो यहाँ स्थित राहु भी बहुत शुभ माना जाता है,यहाँ स्थित राहु जातक की सभी इच्छाओं को पूरा करने का सामर्थ्य रखता है ,बुद्धि भी बहुत तेज होती है और व्यवहार कुशल ऐसे जातक होते है,ऐसे जातक लगभग सभी सुखों को भोगते हुए जीवन को व्यतीत करते है ।

    द्वादश में राहु को बहुत निकृष्ट माना जाता है। ऐसा जातक जातिका  जल रोग (खासी नजला जुकाम बुखार)से पीडित रहते है,और बहुत खर्च करने वाला होता है। ऐसा व्यक्ति छिपा हुआ पाप भी खूब करते है,जन्मभूमि से भी ऐसे जातक अक्सर दूर रहते है,विदेशों से इन्हें खूब लाभ होता है, खर्चो पर नियंत्रण रखना होगा नहीं तो इनके खर्च बहुत होता है ।


  • ज्येष्ठ मास में विवाह का विचार

    ज्येष्ठ मास में विवाह का विचार


    जेष्ठ मास में किसके लिए विवाह वर्जित  माने जाते है?

    ज्येष्ठ मास, ज्येष्ठ पुत्र और ज्येष्ठ कन्या यह तीन ज्येष्ठ विवाह संस्कार में विशेष वर्जित माने जाते हैं। परन्तु यदि दो ज्येष्ठ वर्तमान हों अर्थात लड़का-लड़की दोनों ज्येष्ठ (बड़े) हीं, परन्तु महीना ज्येष्ठ के अतिरिक्त हो अथवा लड़का-लड़की में से एक ज्येष्ठ हो और दूसरा अनुज तो भी जेष्ठ मास  में भी विवाह करना सामान्य एवं मध्यम फल होता है-

    किसी विशेष परिस्थिति में विवाह करना पड़े तो यथा शक्ति दान अनुष्ठान जरूर करे.

    स्वर्ण गो दान अपनी क्षमता अनुसार करके ही विवाह करना चाहिए वो भी तब जब कोई अन्य विकल्प आपके पास न हो ।

  • वृषभ लग्न के बारह भावों में सूर्य के फल-

     वृषभ का सूर्य- प्रथम स्थान  में शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो माता के पक्ष में कुछ नीरसता युक्त शक्ति प्राप्त करेगा और भूमि मकानादि का कुछ सुख और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा घरेलु वातावरण के सम्बन्ध में कुछ त्रुटियुक्त सुख शक्ति प्राप्त करेगा तथा तेजस्वी सूर्य के लग्न में बैठने से देह के अन्दर प्रभाव रहेगा, किन्तु देह की सुन्दरता में कुछ कमी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में सुख शक्ति और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ सुख युक्त वातावरण के द्वारा सफलता और प्रभाव की शक्ति पायेगा। 

    वृषभ लग्न में मिथुन का सूर्य- दूसरे धन स्थान एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो धन के कोष में सुख शक्ति और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब का सुख पायेगा, किन्तु धन का स्थान कुछ बन्धन का-सा कार्य करता है, इसलिये माता के सुख में कुछ कमी रहेगी और घरेलू सुख सम्बन्धों में त्रुटियुक्त मार्ग से शक्ति मिलेगी और भूमि मकानादि के सुख सम्बन्ध में जायदाद की शक्ति होते हुए भी जायदाद का उपभोग सुन्दरता युक्त रूप से प्राप्त नहीं होगा और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की सुख शक्ति मिलेगी और पुरातत्व शक्ति से सुख प्राप्त होगा तथा जीवन की दिनचर्या में सुख और प्रभाव रहेगा।

    यदि कर्क का सूर्य- तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान में मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो माता की शक्ति का प्रभाव पायेगा और भूमि कानादि घरेलू सुख की शक्ति रहेगी एवं तीसरे स्थान पर गरम ग्रह विशेष शक्तिशाली फल का दाता होता है. इसलिये पराक्रम शक्ति के द्वारा बड़ी सफलता और सुख शक्ति प्राप्त रहेगी तथा भाई बहिन का सुख और प्रभाव पायेगा तथा परिश्रम शक्ति से प्रभाव की वृद्धि होगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य के सम्बन्ध में उन्नति करने के लिये बहुत कुछ कठिन प्रयत्न करेगा और धर्म के पालन स्थान के कुछ-कुछ नीरसता युक्त मार्ग से धर्म का करेगा तथा पुरुषार्थ में भरोसा रखेगा।

    वृषभ लग्न में  यदि सिंह का सूर्य- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो माता की महान् शक्ति पायेगा तथा भूमि मकानादि की सुख शक्ति का प्रभावशाली योग प्राप्त करेगा और घरेलू वातावरण के अन्दर सुख शक्ति का सुन्दर योग प्राप्त करेगा, किन्तु तेजस्वी सूर्य की विशेषता के कारण दिखावे में विशेष प्रभाव रहेगा, किन्तु वास्तविक शान्ति की कुछ कमी प्रतीत होगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को प्रशनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये पिता एवं राज-समाज में कुछ असन्तोष युक्त शक्ति के द्वारा सुख प्राप्त करेगा और व्यापार के पक्ष में कठिन मार्ग के द्वारा सफलता पायेगा और मान-प्रतिष्ठा, इज्जत-आबरू  पायेगा।

    यदि कन्या का सूर्य- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में मित्र बुध की कन्या राशि पर बैठा है तो विद्या स्थान में सुख पूर्वक शक्ति और ज्ञान प्राप्त करेगा तथा सन्तान पक्ष में सुख और प्रभाव प्राप्त रहेगा और बुद्धि के अन्दर पृथ्वी तत्व का अधिकारी सूर्य के बैठने से बुद्धि के अन्दर बड़ी गम्भीरता और विशाल शक्ति प्राप्त होगी तथा वाणी में दूरदर्शिता और प्रभाव रहेगा और बुद्धि योग के द्वारा घरेलू सुख का विशेष आनन्द प्राप्त होगा तथा भूमि और माता का सहयोग पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये सुख पूर्वक बुद्धि योग के द्वारा आमदनी के मार्ग में अच्छी सफलता पायेगा।

    वृषभ लग्न में यदि तुला का सूर्य छठें शत्रु स्थान में नीच का होकर शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो माता के स्थान में हानि प्राप्त करेगा तथा जन्म भूमि वियोग रहेगा और मकानादि भूमि की कमी रहेगी तथा घरेलू सुख के साधनों में विशेष कमी रहेगी और झंझट युक्त मार्ग के द्वारा सुख प्राप्त कर सकेगा तथा शत्रु पक्ष से कुछ अशान्ति रहेगी। किन्त गरम ग्रह होने के कारण से सूर्य के नीच होने पर भी कुछ प्रभाव कायम रखेगा और सातवी उच्च दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है. इसलिये खर्चा विशेष रहेगा और बाहरी स्थान का उत्तम सुखदायक सम्बन्ध पायेगा तथा विशेष खर्च के द्वारा सुख के साधन पायेगा। 

    यदि वृश्चिक का सूर्य- सातवें केन्द्र, स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में सख और प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा तथा माता का सुन्दर सहयोग पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में प्रभाव युक्त सुख शक्ति पायेगा और स्त्री गृहस्थ के रहन-सहन में भूमि मकानादि का अच्छा सहयोग पायेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता में कमी रहेगी और गृहस्थ के अन्दर की सुख सामग्रियों में त्रुटि प्रतीत होती रहेगी तथा गृहस्थी संचालन के कार्य कारणों से देह को आराम कम मिलेगा, इसलिये हृदय में कुछ अशान्ति रहेगी। 

    वृषभ लग्न में यदि धनु का सूर्य- आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो माता के स्थान में हानि करेगा तथा मातृ-भूमि से वियोग रहेगा अर्थात् जन्म स्थान और भूमि मकानादि के सुख में बड़ी कमी रहेगी और घरेलू सुख शान्ति के मार्ग में बड़ा असन्तोष रहेगा, १० किन्तु सुखेश सूर्य अष्टम स्थान में बैठा है, इसलिये आयु का सुख रहेगा और जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने का प्रयत्न चालू रहेगा और कुटुंब के स्थान में सुख सम्बन्ध प्राप्त रहेगा तथा धन प्राप्त करेगा।

    वृषभ लग्न में मकर का सूर्य नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है त्तो माता के पक्ष में कुछ नीरसता युक्त मार्ग के द्वारा शक्ति प्राप्त करेगा और भूमि मकानादि का योग भाग्य से पायेगा तथा घरेलू वातावरण में कुछ सुख प्राप्त रहेगा और भाग्य के अन्दर प्रभाव शक्ति रहेगी तथा धर्म का पालन भी रहेगा, किन्तु शत्रु राशि पर होने के कारण से भाग्य की खूबसूरती में कुछ कमी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन का सुख सम्बन्ध प्राप्त करेगा और पराक्रम स्थान में सुख पूर्वक भाग्य की शक्ति के योग से सफलता प्राप्त करेगा।

    वृषभ लग्न में यदि कुम्भ का सूर्य- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो पिता के सम्बन्ध में कुछ नीरसता युक्त मार्ग के द्वारा शक्ति प्राप्त करेगा और कुछ कठिनाई के द्वारा राज-समाज में मान तथा प्रभाव प्राप्त करेगा और कारबार में शक्ति एवं सफलता पायेगा, किन्तु शत्रु राशि पर सूर्य के होने से प्रभाव की शक्ति जितनी अधिक रहेगी उतनी सफलता शक्ति का आनन्द प्राप्त न हो सकेगा, परन्तु सातवीं दृष्टि से वौथे सुख भवन को स्वयं अपनी सिंह राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है. इसलिये भूमि मकानादि की शक्ति प्राप्त रहेगी तथा मातृ पक्ष में एवं घरेल सुख के साधनों मे प्रभाव और आनन्द का योग मिलेगा और सुख पूर्वक उन्नति के  लिये प्रयत्न करेगा। 

    वृषभ लग्न में यदि मीन का सूर्य- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान में क्रूर या गरम ग्रह विशेष शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति पायेगा और भूमि मकान इत्यादि का लाभ रहेगा तथा माता के सम्बन्ध से सुख लाभ पायेगा तथा घरेलू वातावरण से सुख के अच्छे साधन प्राप्त करेगा ओर सुखेश होकर सूर्य लाभ स्थान में बैठा है, इसलिये सुख पूर्वक आमदनी का कोई विशेष योग प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या पक्ष से सुख और प्रभाव पायेगा तथा विद्या-वृद्धि के अन्दर शान्ति युक्त एवं सन्तान स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है. इसलिये सन्तान प्रभाव शक्ति से सफलता पायेगा।

    वृषभ लग्न में यदि मेष का सूर्य- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में उच्च का होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो खर्चा बहुत अधिक करेगा तथा बाहरी स्थानों में विशेष सुखदायक सम्बन्ध पायेगा। किन्न अपने स्थान में घरेलू सुख के साधनों में कुछ कमी रहेगी और माता के पक्ष में भी कुछ कमी का योग बनेगा तथा भूमि मकानादि के सम्वन्ध में भी कुछ हानि प्राप्त होगी, क्योंकि खर्च के स्थान में गरम ग्रह का फल प्रायः हानिकारक होता है, इसलिये अपने जन्म स्थान में कमी रहेगी और दूसरे स्थान में प्रभाव खूब रहेगा और सातवीं नीच दृष्टि से शत्रु स्थान को शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष मे कुछ पेचीदी शक्ति के योग से कार्य सम्पन्न करेगा। 

  • सरकारी_ नौकरी _के _योग -


    वर्तमान समय के परिप्रेक्ष्य में निजी संस्थानों में कैरियर को लेकर अनिस्तिताओं के कारण युवाओं का रुझान सरकारी नौकरी की तरफ़ दिख रहा है,इस कारण अधिकांश युवा सरकारी नौकरी के लिए प्रयाशरत है। जिनमें कुछ को मनमाफिक सफलता मिल जाती है। तो कुछ लोग बारम्बार प्रयाश करने के बावजूद हर बार निराशा हो जाते है ।
    आइए जानते है, कि कुण्डली में कोन से ऐसे योग होने चाहिए कि व्यक्ति को सरकारी नोकरी आसानी से प्राप्त हो अथवा कम प्रयास के बाद भी प्राप्त हो और जीवन में स्थिरता का अनुभव मिले ।

    (1) कुण्डली में सूर्य की स्थिति मजबूत और शुभहोनी चाहिए, कुण्डली में सूर्य प्रथम चतुर्थ  छठे दशम एकादश तथा द्वितीय भाव में हो ।

    (2)कुण्डली में कर्मेश (दशम भाव का स्वामी) मजबू स्थिति जैसे कि उच्च राशि या स्वा शशि में विद्यमान हो।

    (3)कर्म भाव यानि कि दशम भाव पर पाप ग्रह री दृष्टि न हो, मोर कमेश नीच यो अस्तंगत न हो।

    (4) स्वराशि का कोई भी ग्रह कसे भाव में हो भीर हो द्वितीय (धन भाव) का सम्बन्ध सूर्य से बनता हो !

    (5)दशम भाव का खामी दशम से 6,8,12 वे' भाव में न गया हो, ।
     
    (6) कुंडली के दशम भाव में मजबूत गजकेशरी योग बन रहा हो या शश योग बन रहा हो ।
  • मेष लग्न में सूर्य का बारह भावों में फल-

     मेष लग्न का फलादेश


    विद्या बुद्धि-संतान स्थानपति सूर्य यदि मेष का सूर्य-प्रथम केन्द्र देह के स्थान मेष लग्न में सूर्य  उच्च का होकर, मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो देह का कद प्रभावशाली रहेगा और बुद्धि में उत्तेजना शक्ति रहेगी तथा विद्या के स्थान में महानता प्राप्त होगी और वाणी में प्रभाव रहेगा तथा हृदय में बड़ा भारी स्वाभिमान होगा तथा संतान पक्ष में, उत्तम शक्ति रहेगी, किन्तु सूर्य, सातवीं नीच दृष्टि से, स्त्री एवं रोजगार के स्थान को देख रहा है। इसलिए स्त्री स्थान में क्लेश एवं कष्ट तथा सुन्दरता की कमी प्राप्त होगी और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानियाँ तथा कुछ कमी प्रतीत होगी और गृहस्थी के सुख सम्बन्धों में एवं उसके संचालन में कुछ दिक्कतें रहेंगी ,


    मेष लग्न में सूर्य यदि वृषभ का सूर्य- दूसरे, धन एवं कुटुम्ब स्थान में, शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो धन का स्थान कुछ बन्धन का-सा भी कार्य करता है, इसलिए संतान पक्ष में बाधा रहेगी और विद्या के ग्रहण करने में कुछ दिक्कतों के योग से शक्ति प्राप्त होगी, किन्तु बुद्धि योग द्वारा धन की वृद्धि का विशेष प्रयत्न किया जायेगा, परन्तु धन की संचित शक्ति के अन्दर कुछ त्रुटि रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से, आयु एवं पुरातत्व स्थान को, मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है इसलिये आयु की वृद्धि रहेगी और पुरातत्व शक्ति का लाभ बुद्धि योग द्वारा प्राप्त होगा तथा जीवन की दिनचर्या में, बड़ा भारी प्रभाव रहेगा और कुटुम्ब का कुछ प्रभाव रहेगा।


    मेष लग्न में सूर्य मिथुन का सूर्य- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में, मित्र बुध की राशि पर बैठा है, इसलिये विद्या बुद्धि के अन्दर बड़ी भारी शक्ति मिलेगी और तीसरे स्थान पर, गरम ग्रह बहुत शक्ति-शाली फल का दाता हो जाता है, इसलिये पराक्रम- पुरुषार्थ की बहुत वृद्धि होगी तथा बड़ा भारी प्रभाव रहेगा और दिमाग के अन्दर तथा वाणी के अन्दर तेजी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से, भाग्य एवं धर्म स्थान को, गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग की शक्ति के द्वारा, भाग्य की वृद्धि होगी और धर्म कर्म के कार्यों में लगा रहेगा,


    मेष लग्न का सूर्य- चौथे केन्द्र, माता एवं भूमि के स्थान पर, मित्र चन्द्र की राशि में बैठा है, इसलिए सुखपूर्वक विद्या प्राप्त होगा तथा संतान पक्ष की तरफ से सुख रहेगा और बुद्धि के अन्दर तेजी रहते हुए भी शान्ति धारण करेगा तथा बुद्धि की योग्यता से भूमि और मकानादि की शक्ति का प्रभाव प्राप्त करेगा और माता की सुख शक्ति रहेगी तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से, पिता एवं राज्य स्थान को, शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिए पिता के सम्बन्ध में कुछ वैमनस्यता प्राप्त करेगा और राज्य के मार्ग में कुछ नीरसता रहेगी तथा कुछ मान और प्रभाव प्राप्त करेगा।


    मेष ल सिंह का सूर्य- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान पर, स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो, विद्या की महान् शक्ति प्राप्त ११ करेगा तथा वाणी और बुद्धि की महान् तेजी के कारण, बड़ा भारी प्रभाव रखेगा तथा संतान पक्ष के अन्दर बड़ा शक्तिशाली पुत्र प्राप्त होगा और अपनी बुद्धि की योग्यता के सम्मुख दूसरों की बुद्धि को छोटा समझेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को, शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष प्रयत्न करने पर लाभ (प्राप्त) की तरफ से कुछ असंतोष रहेगा, किन्तु लाभ के मार्ग में कुछ कटु भाषण से कार्य सम्पादन करेगा।


    यदि कन्या का सूर्य - छठें, शत्रु एवं झगड़े- झंझट के स्थान पर, मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो विद्या ग्रहण करने में कुछ दिक्कतें रहेंगी, किन्तु ११ विद्या और बुद्धि के द्वारा बड़ा भारी प्रभाव प्राप्त करेगा और संतान पक्ष के अन्दर कुछ परेशानी रहेगी, किन्तु छठें स्थान पर गरम ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिए शत्रु पक्ष में बड़ा भारी सफलता शक्ति और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से, खर्च एवं बाहरी स्थान को, गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिए खर्चा खूब धर्म करेगा और बद्धि योग द्वारा बाहरी स्थानों में सफलता शक्ति पायेगा और प्रतिस्पर्धा में हमेशा आगे रहेगा,


    तुला का सूर्य- सातवें केन्द्र, स्त्री एवं रोजगार के स्थान पर नीच का होकर शत्रु शुक्र की राशि में बैठा है, इसलिये विद्या स्थान में कमजोरी रहेगी ११ तथा बुद्धि और विवेक की लघुता से कार्य करेगा और संतान पक्ष में कुछ कमी रहेगी तथा स्त्री के सुख स्थान में परेशानी अनुभव होगी और रोजगार के मार्ग में दिक्कतों से एवं दिमागी परिश्रम से कार्य सम्पादन करेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से देह के स्थान को, मित्र मंगल की मेष राशि में देख ९ रहा है इसलिये देह के कद में कुछ लम्बाई प्राप्त होगी तथा हृदय में कुछ विशेष रहेगा और बुद्धि की युक्ति से मान एवं प्रभाव छिपा हुआ स्वाभिमान प्राप्त करेगा।


    यदि वृश्चिक राशि का सूर्य-आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्व स्थान में, मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो विद्या ग्रहण करने में दिक्कतें और ११ कमजोरियाँ रहेंगी तथा संतान पक्ष में कष्ट अनुभव होगा और दिमाग में कुछ परेशानियाँ रहेंगी तथा जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा तथा आयु में शक्ति होगी और पुरातत्व सम्बन्ध में बुद्धि योग द्वारा प्रभाव और चमत्कार रहेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को, शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये धन के कोष की वृद्धि करने में, बड़ा प्रयत्नशील रहेगा, किन्तु फिर भी धन और कुटुम्ब की तरफ से कुछ असन्तोष युक्त शक्ति प्राप्त होगी। 


    यदि धनु राशि का सूर्य- नवम त्रिकोण, भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो बड़ी प्रभावशालिनी विद्या प्राप्त करेगा तथा बुद्धि ११ के अन्दर उच्चतम शक्ति पायेगा और धर्म शास्त्र का अच्छा ज्ञान पायेगा तथा बुद्धि योग के द्वारा भाग्य की महान् वृद्धि करेगा और संतान पक्ष में सू. उत्तम सहयोग प्राप्त करेगा तथा वाणी के द्वारा बड़ा प्रभाव और यश पायेगा तथा ईश्वर और न्याय पर विश्वास मानेगा और सातवीं मित्र दृष्टि ९ से भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है,


    यदि मकर राशि का सूर्य- दशम केन्द्र, पिता एवं राज्य स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो, पिता स्थान में कुछ वैमनस्यता युक्त शक्ति प्राप्त करेगा तथा विद्या के पक्ष में कुछ अड़चनों के द्वारा राजभाषा की योग्यता पायेगा और दिमाग एवं विचारों के अन्दर बड़ी भारी उत्तेजना क्रोध तथा अहंभाव रखेगा और संतान पक्ष के सम्बन्ध में कुछ अरूचिकर सहयोग शक्ति प्राप्त होगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये माता का और भूमि का अच्छा योग पायेगा तथा राज और समाज व कारबार के मार्ग में बुद्धि योग से उन्नति प्राप्त करेगा।


    यदि कुम्भ राशि का सूर्य- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर क्रूर या गरम ग्रह शक्तिशाली फल का दाता होता है। इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष उन्नति करने के लिये बड़ा भारी परिश्रम करेगा और बुद्धि योग के द्वारा विशेष सफलता प्राप्त करेगा तथा आमदनी के मार्ग में बड़ा प्रभाव रहेगा और सातवीं दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को, स्वयं अपनी सिंह राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये विद्या की शक्ति प्राप्त करेगा और संतान शक्ति प्राप्त रहेगी तथा स्वार्थ सिद्धि के मार्ग में बड़ी दृढ़ता और तत्परता तथा वाणी की कटुता से कार्य में सफलता पायेगा। 


    यदि मीन का सूर्य- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो खर्च की विशेष संचालन शक्ति बुद्धि योग द्वारा करेगा और बाहरी स्थानों का अच्छा सम्बन्ध प्राप्त करेगा, किन्तु व्यय स्थान के दोष के कारण विद्या के पक्ष में कमजोरी रहेगी और संतान पक्ष में कुछ कमी और परेशानी तथा हानि के कारण प्राप्त करेगा तथा दिमाग के अन्दर कुछ परेशानी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को, बुध की राशि में देख रहा शत्रुओं से भय बना रहेगा ।

  • जन्म राशि और नाम राशि किसे माने-

     प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में उसके प्रचलित नाम का विशेष महत्त्व होता है। परिवार, समाज, शिक्षा, कैरियर, मित्रता इत्यादि प्रत्येक कार्य क्षेत्र में मनुष्य अपने प्रसिद्ध नाम से जाना जाता है। एक अच्छा नाम जो किसी महान् व्यक्ति के नाम सदृश हो, उसके लिए जीवन पर्यन्त प्रेरणा स्रोत का काम करता है। इसी कारण हमारे प्राचीन ऋषि या ज्योतिषाचार्य जन्मराश्यनुसार बालक का नाम कुलदेवता, महान् पुरुष, देववाचक, मंगलदायक, या कुल/परम्परा के अनुरूप सार्थक नाम रखते थे। उनके अनुसार मनुष्य के आन्तरिक गुणों एवं ब्राह्म व्यक्तित्व के विकास तथा भाग्य वृद्धि में नामकरण का विशेष महत्त्व होता था-

     विद्वानों ने वैसे तो जन्म नक्षत्र एवं जन्म राशि के आधार पर ही जातक का नाम रखने की आज्ञा दी है, परन्तु परिस्थिति वश किसी व्यक्ति की जन्म कुण्डली में चन्द्रस्थित जन्म राशि में तथा, प्रसिद्ध नाम राशि में अन्तर होने की स्थिति में, दोनों राशियों के अन्तर्गत अलग-अलग कार्य  को करने का परामर्श दिया है।

    जन्म राशि (विचार )  

    वर कन्या का राशि मिलान, विवाह निर्णय, गर्भाधान, पुंसवन उपनयन, मुण्डन, विवाह षोडश संस्कार एवं मांगलिक कार्य, तीर्थादि की शुभ यात्रा, राशि से गोचर ग्रहों का फल-प्रतिपादन करना इत्यादि प्रशस्त है-

    प्रसिद्ध नाम राशि (विचार) - 

    प्रसिद्ध नाम राशि का प्रयोग गृहारम्भ, गृह प्रवेश, ज्योतिषाचार्य सांसारिक व्यवहार, व्यापार (व्यवसाय), देश-कार्य, मन्त्र-सिद्धि, दानादि के समय संकल्प कुल कार्य, पुनर्विवाह, स्वामी व सेवक के पारस्परिक सम्बन्ध, रोगशान्ति हेतु औषधी प्रयोग, ब्राह्म विवाद, मुकद्दमा, युद्ध, छूतादि क्रूर कार्यों तथा दानादि शुभ संकल्पों में नाम राशि का ही प्रयोग करना चाहिए-

     जन्म राशि का ज्ञान न हो, तो नाम राशि को ही ग्रहण करें।


  • घर में है वास्तु दोष तो क्या करे-

     

    यदि आपका भवन/निवास स्थान वास्तु सिद्धान्त के विपरीत हो तो कुछ निम्न दैनिक दिनचर्या में परिवर्तन कर आप शुभ फल प्राप्त तथा अनिष्ट प्रभाव से बच सकते हैं।

    जब भी पानी पीएं अपना मुख उत्तर-पूर्व की ओर रखें।

    जब भी भोजन ग्रहण करें थाली दक्षिण-पूर्व की ओर रखें और पूर्वाभिमुख होकर

    भोजन करें।

    जब भी सोएं दक्षिण-पश्चिम कोण में दक्षिण की ओर सिरहाना करके सीने से नींद गहरी और अच्छी आती है।

    जब भी पूजा करें तो मुख उत्तर-पूर्व या उत्तर-पश्चिम की ओर करके बैठें।

    सम्यक उन्नति हेतु लक्ष्मी, गणेश, कुबेर, स्वस्तिक, ॐ, मीन एवं शुभ आदि मांगलिक चिन्ह मुख्यद्वार के ऊपर स्थापित करें।

    यदि घर में कोई पूजा-स्थल नहीं है तो उसे उत्तर-पूर्व (ईशान) कोण में रखें।

    यदि पूर्व-उत्तर दिशा का भाग ऊंचा हो तो दक्षिण-पश्चिम भाग में कोई निर्माण कार्य

    करा दें जिससे पूर्व-उत्तर दिशा का भाग नीचा हो जाए।

    यदि भवन के सामने का उत्तर-पूर्व दिशा का फर्श दक्षिण-पश्चिम से बने फर्श से ऊंचा हो तो दक्षिण-पश्चिम दिशा के फर्श को ऊंचा करें। ऐसा नहीं कर सकते तो पश्चिम-

    दिशा के कोने में एक प्लेट फार्म बनाएं।

    रसोई घर गलत स्थान पर हो तो अग्निकोण (पूर्व-दक्षिण)में एक बल्ब लगाएं उसे हमेशा जलाए ।

  • ग्रह से रिश्तों का विचार

      अव यह बताते हैं कि किस-किस ग्रह से क्या-क्या और विचार करना

    चाहिये । सूर्य-यदि दिन में जन्म हो तो पितु कारक, यदि रात्रि में जन्म हो तो में दक्षिण नेत्र पर इसका विशेष अधिकार है।

    का कारक । शरीर

    चाचा चन्द्रमा - यदि रात्रि में जन्म हो तो मातृ कारक, यदि दिन में जन्म हो तो चन्द्रमा से मौसी का विचार करें । शरीर में, बायें नेत्र पर इसका विशेष अधिकार है।

    मंगल-मंगल से छोटे भाई का विचार करना चाहिये ।

    बुध-गोद लिया हुआ पुत्र (दत्तक पुत्र) ।

    वृहस्पति-बड़ा भाई ।

    शुक्र-यदि दिन में जन्म हो तो मातृ कारक, यदि रात्रि में जन्म हो तो इससे मौसी का विचार करे ।

    शनि-यदि दिन में जन्म हो तो चाचा का विचार इससे करे और यदि रात्रि में जन्म हो तो इससे पिता का विचार करे ॥ 

  • कैसे जाने आपका कर्म क्षेत्र क्या होगा-

    लग्न या चन्द्रमा से दशम में कौन सा ग्रह है। वह ग्रह अपने मार्ग से घन प्राप्ति करावेगा यह एक बात बतायी। अब दूसरी बात बताते हैं। यह देखिये कि लग्न, सूर्य और दशम इन तीनों में बलवान् कौन है । जो इन तीनों में अधिक बलवान् हो उससे दशम राशि कौनसी पड़ती है ? उस दशम राशि का स्वामी किस नवांश में है ? उस नवांश का स्वामी कौनसा ग्रह है ? जो ग्रह आवे उस ग्रह के गुण, स्वभाव, साधन से जातक को धन प्राप्ति होगी। उदाहरण के लिये एक कुण्डली दी जाती है। इसमें सिंह लग्न है, सूर्य वृश्चिक में है, और चन्द्रमा मीन में है। मान लीजिये ४ लग्न सबसे बलवान् है तो लग्न से ७५ दशम वृष राशि हुई। इसका स्वामी ३ शुक्र मान लीजिये तुला राशि में ५ अंश का है तो शुक्र वृश्चिक नवांश में २ हुआ क्योंकि तुला राशि के ३०-२०' से १ ६०-४०' तक वृश्चिक नवांश रहता है । वृश्चिक नवांश का स्वामी मंगल है। इस कारण मंगल के स्वभाव, गुण, साधन और वृत्ति द्वारा थन लाभ कहेंगे ।

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