वृश्चिक लग्न में यदि वृषभ का सूर्य- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में कुछ नीरसता युक्त प्रभाव की शक्ति पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ कठिनाईयों के योग से उन्नति करेगा तथा पिता स्थान की कुछ सहायक शक्ति प्राप्त होगी और राज-समाज से सम्बन्धित कार्यों में कुछ मान और प्रभाव पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये देह में प्रभाव और गौरव प्राप्त करेगा तथा कुछ शोभा युक्त वस्त्र तथा कारबार की उन्नति करने के लिये विशेष प्रयत्न करता रहेगा।
वृश्चिक लग्न में यदि मिथुन का सूर्य- आठवें मृत्यु स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पिता के सम्बन्ध में हानि और परेशानी का योग पायेगा और राज-समाज के सम्बन्ध में कमजोरी रहेगी तथा कारबार की उन्नति के मार्ग में विशेष कठिनाईयाँ मिलेंगी और आयु स्थान में शक्ति मिलेगी तथा जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा और पुरातत्त्व सम्बन्ध की शक्ति का लाभ रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धनु राशि में देख रहा है, इसलिये कठिन परिश्रम के द्वारा धन की वृद्धि के कारण उत्पन्न करेगा और कुटुम्ब में कुछ प्रभाव होगा। तथा कुछ दूसरे स्थान का सम्पर्क पायेगा।
वृश्चिक लग्न में यदि मिथुन का सूर्य- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति के अन्दर विशेष प्रभाव पायेगा तथा धर्म का पालन करेगा तथा कारबार की उन्नति के मार्ग में भाग्य की शक्ति के बल पर उन्नति पायेगा और उत्तम आदर्श कर्म के द्वारा सफलता और यश प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिए भाई-बहिन के पक्ष में मतभेद रखेगा और पराक्रम शक्ति के स्थान में कुछ नीरसता के साथ शक्ति और प्रभाव पायेगा।
वृश्चिक लग्न में यदि सिंह का सूर्य दशम केन्द्र पिता स्थान में एवं राज्य स्थान में स्वं अपनी राशि पर बैठा है तो पिता स्थान की शक्ति का प्रभाव पायेगा तथा सूर्य राज-समाज में मान एवंद शक्ति प्राप्त करेगा और कारबार की उन्नति के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति पायेगा तथा मान-प्रतिष्ठा एवं प्रभाव की वृद्धि करने के लिये उग्र कर्म करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं मकानादि के सुख भवन को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सम्बन्ध में वैमनस्यता अथवा नीरसता पायेगा और भूमि मकानादि के स्थान में एवं सुख सम्बन्धों में कुछ कमी प्रतीत होगी।
वृश्चिक लग्न में यदि कन्या का सूर्य- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान के सम्बन्ध से विशेष लाभ पायेगा और राज-समाज उत्तम शक्ति पायेगा और कारबार के मार्ग में विशेष लाभ करेगा और मान-प्रतिष्ठा एवं प्रभाव की शक्ति पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से संतान एवं विद्या स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में शक्ति और प्रभाव अन्दर शक्ति और प्रभाव पायेगा तथा विद्या पायेगा तथा हुकूमत और तेजी का स्वभाव पायेगा।
वृश्चिक लग्न में यदि तुला का सूर्य- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में शत्रु शुक्र की राशि पर नीच का होकर बैठा है तो खर्च के स्थान में बड़ी दिक्कतें पायेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में बड़ी कमजोरी रहेगी और पिता स्थान की तरफ से कष्ट और कमजोरी रहेगी तथा कारबार की उन्नति के लिये बड़ी परेशानियाँ प्राप्त करेगा एवं राज-समाज के सम्बन्ध में प्रभाव की कमी और कभी-कभी मानहानि के कारण पायेगा तथा कुछ परतन्त्रता युक्त कर्म करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से शत्रु के स्थान को मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव रखेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में शक्ति से काम करेगा।
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