इन्हीं सवालों के जबाव को लेकर हम आपकी संका दूर करते है।किसी भी पुरुष की कुंडली में विवाह का कारक ग्रह शुक्र और विवाह कराने वाला ग्रह देवगुरु बृहस्पति होता है,
शादी का समय किसी भी इन्सान का तब आएगा जब कुण्डली में गुरू का गोचर अनुकूल भाव में होगा,
जैसे कि गुरु जब भी कुण्डली में लग्न या लग्नेश से सम्बन्ध बनाऐ,
सप्तम भाव से गुरू का सम्बन्ध हो अथवा सप्तमेश से,
पञ्चम अथवा पञ्चमेश से गुरू का सम्बन्ध हो,
गोचरवश लग्नेश व सप्तमेश की युति प्रतियुति हो,
राहु गोचर भ्रमण करते हुए जब भी सप्तम भाव से सम्बन्ध बनाए तो चट मंगनी पट ब्याह वाली स्थिति उत्पन्न होती है,
गोचर वश लग्नेश लग्न में और सप्तमेश सप्तम भाव में हो तो विवाह की सम्भावना बढ जाती है,
इसकी अतिरिक्त लग्नेश की दशा और सप्तमेश की अन्तर्दशा,
सप्तमेश की दशा अन्तर्दशा हो,
गुरू शुक्र की दशा अन्तर्दशा में भी विवाह सम्भाव्य हो जाता है,

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