छठा भाव शत्रु स्थान है। पाप ग्रह शत्रुओं का नाश करेगा इसलिये छठे भाव में पाप ग्रह होना उत्तम है। यह भी प्रसिद्ध उक्ति है कि ३, ६, ११ इन स्थानों में मंगल, शनि, राहु हो तो उत्तम हैं। इसका भी आशय यही है कि पाप ग्रह छठे में रहकर शत्रु और रोग को नष्ट करेगा। अब मन्त्रदेवर महाराज का मत लीजिये। वे इस सिद्धान्त को पकड़ते हैं कि किसी भाव का सुख तभी प्राप्त होता है जब भावेश बलवान् हो- पहली बात । इसमें तो किसी को आपत्ति हो ही नही सकती। किन्तु दुःस्थान का स्वामी किसी दुःस्थान में बैठे तो भी अच्छा ही माना जाता है इसका तात्पर्य है की आठवे बारहवे भाव का स्वामी अगर छठे भाव में बैठे तो परम शत्रु हंता योग बनता है ।ऐसे व्यक्तियों के शत्रु स्वयं नष्ट हो जाते है ।
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